कुछ राजनीतिक दल चुनाव हारते हैं।
कुछ राजनीतिक दल सरकारें हारते हैं।
और फिर कुछ राजनीतिक दल ऐसे होते हैं जो अपनी दिशा ही खो देते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज शायद इसी तीसरी श्रेणी में प्रवेश कर चुकी है।
कभी कांग्रेस केवल एक राजनीतिक पार्टी नहीं थी। वह अपने आप में एक पूरा राजनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र थी। उसके पास कार्यकर्ता थे, स्वयंसेवक थे, वैचारिक प्रशिक्षण था, छात्र संगठन थे, युवा संगठन थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे, ट्रेड यूनियन थे, स्थानीय समितियाँ थीं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसके कार्यकर्ताओं को अपने मतदान केन्द्र से तीन गलियाँ दूर रहने वाले आदमी का नाम तक पता होता था।
आज कभी-कभी ऐसा लगता है कि कांग्रेस को अपने मुख्यालय का पता अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के पते से अधिक अच्छी तरह मालूम है।
ग्रैंड ओल्ड पार्टी अभी भी ग्रैंड है। अभी भी ओल्ड है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या वह संगठनात्मक अर्थों में अभी भी एक पार्टी है?
कांग्रेस की समस्या केवल यह नहीं है कि उसने चुनाव हारे हैं। राजनीतिक दल चुनावी पराजय से उबरते रहते हैं। उसकी गहरी समस्या यह है कि वह उस संगठनात्मक मशीनरी का बड़ा हिस्सा खो चुकी है जो चुनावी वापसी को सम्भव बनाती है।जरा कांग्रेस सेवा दल को देखिए।
1924 में हिन्दुस्तानी सेवा मंडल के रूप में इसकी स्थापना हुई थी। जवाहरलाल नेहरू इसके पहले अध्यक्ष बने। इसका उद्देश्य था स्वयंसेवकों को राष्ट्रीय सेवा, शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन और शांतिपूर्ण जन-संगठन के लिए तैयार करना। 1931 में इसका नाम कांग्रेस सेवा दल कर दिया गया और स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान इसने कांग्रेस के जमीनी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जरा कल्पना कीजिए।
एक राजनीतिक पार्टी कभी अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना जरूरी समझती थी।सिर्फ नारे लगाने के लिए नहीं।सिर्फ नेता के पीछे फोटो खिंचवाने के लिए नहीं।सिर्फ टेलीविजन बहस में उल्टा-पुल्टा तर्क देने के लिए नहीं।प्रशिक्षण।अनुशासन।जिम्मेदारी।समाज के बीच काम।कांग्रेस को कभी यह समझ थी कि राजनीतिक संगठन के लिए वास्तव में संगठन चाहिए।क्या विचार था!
फिर आजादी आई।अंग्रेज चले गए।और ऐसा लगता है कि संगठन बनाने के कुछ कारण भी उनके साथ ही चले गए।
जैसे-जैसे राजनीति अधिकाधिक चुनाव-केंद्रित और व्यक्तित्व-केंद्रित होती गई, सेवा दल का संगठनात्मक महत्व घटता गया। धीरे-धीरे वह समारोहों, झंडा सलामी और पार्टी कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने जैसी भूमिकाओं तक सीमित होता गया।2019 में जब सेवा दल का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो एक छोटी-सी, मगर बहुत कुछ कहने वाली बात सामने आई—ऐसा राष्ट्रीय अधिवेशन लगभग तीस साल के अंतराल के बाद हो रहा था।
तीस साल! इतने समय में कोई रेलवे स्टेशन बन सकता है।एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो सकती है।एक पूरा तकनीकी उद्योग खड़ा हो सकता है।कांग्रेस को याद करने में तीन दशक लग गए कि उसका एक स्वयंसेवी संगठन भी है।
और फिर आता है भारतीय युवा कांग्रेस।
आह! युवा कांग्रेस!
एक समय था जब यह देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक युवा संगठनों में से एक थी।इंदिरा गांधी और संजय गांधी के दौर में युवा कांग्रेस ने युवाओं की लामबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में राजीव गांधी के दौर में भी यह युवा नेतृत्व तैयार करने की एक महत्वपूर्ण नर्सरी बनी रही। इस संगठन से निकले अनेक नेता आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे।
अर्थात कांग्रेस के पास वह चीज थी जिसकी हर बूढ़ी होती राजनीतिक पार्टी को सबसे ज्यादा जरूरत होती है—अपने आपको बदलने और नई पीढ़ी तैयार करने की व्यवस्था।
आज वही व्यवस्था कुछ जंग लगी हुई दिखाई देती है।विडम्बना लगभग कविता जैसी है।
कांग्रेस भारत के युवाओं की बात लगातार करती है।लेकिन उसका संगठनात्मक ढाँचा कई बार कल की भाषा में बोलता हुआ दिखाई देता है।पार्टी युवा बनना चाहती है, लेकिन वास्तव में नई बनना नहीं चाहती।नए चेहरे चाहती है, बशर्ते पुराने तंत्र को वे स्वीकार्य हों।आंतरिक लोकतंत्र चाहती है, बशर्ते वह बहुत असुविधाजनक न हो जाए।दूसरी पंक्ति का नेतृत्व चाहती है।लेकिन दूसरी पंक्ति वर्षों से पहली पंक्ति के पीछे खड़ी होकर शायद यह पूछ रही है कि दूसरी पंक्ति बनने की अनुमति कब मिलेगी।और इन सबके ऊपर गांधी परिवार की छाया बनी रहती है।
कांग्रेस वर्षों से कहती रही है कि पार्टी का विकेंद्रीकरण होना चाहिए।लेकिन सब यह जानने के लिए दिल्ली की ओर देखते हैं कि गांधी परिवार क्या सोचता है।वह मजबूत प्रदेश नेतृत्व चाहती है।लेकिन दिल्ली बार-बार उनके कंधे के ऊपर से झाँकती दिखाई देती है।वह युवा नेता चाहती है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपनाम आज भी वही है।वह योग्यता की बात करती है।लेकिन निष्ठा आज भी एक अत्यंत मूल्यवान योग्यता बनी हुई है।वह संस्थागत मजबूती चाहती है।लेकिन व्यक्तित्व ही संस्था बना हुआ है।
यह केवल राहुल गांधी की समस्या नहीं है।यह कांग्रेस की समस्या है।राहुल गांधी आज कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरों में हैं और लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। पार्टी संगठनात्मक पुनर्गठन की कोशिशें भी कर रही है। लेकिन यहीं कांग्रेस का एक और अद्भुत विरोधाभास सामने आता है।पार्टी बार-बार घोषणा करती है कि वह संगठन को पुनर्जीवित कर रही है।फिर संगठन का पुनर्गठन होता है।फिर संगठन की समीक्षा के लिए समिति बनती है।फिर नई समिति।फिर फेरबदल।फिर एक और फेरबदल की चर्चा।जल्द ही कांग्रेस शायद इतिहास की पहली ऐसी राजनीतिक पार्टी बन जाएगी जो बिना संगठन के भी संगठनात्मक गतिविधियों का विश्व रिकॉर्ड कायम कर देगी।
असल सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के पास प्रतिभाशाली लोग हैं या नहीं।
हैं।
असल सवाल यह है कि क्या उसका तंत्र उन लोगों को खोजने, तैयार करने, उन पर भरोसा करने और उन्हें ऊपर लाने में सक्षम है?
यहीं समस्या गंभीर हो जाती है।
एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल हमेशा के लिए किसी परिवार की विरासत में मिली हवेली की तरह नहीं चल सकता, जिसमें वर्षों से मरम्मत चल रही हो।राजनीतिक पार्टी को संस्थागत स्मृति चाहिए।वैचारिक स्पष्टता चाहिए।आंतरिक प्रतिस्पर्धा चाहिए।स्थानीय नेतृत्व चाहिए।ऐसे लोग चाहिए जो चुनाव हारने के बाद भी अपने निर्वाचन क्षेत्र में टिके रहें।ऐसे कार्यकर्ता चाहिए जो टेलीविजन कैमरे हटते ही गायब न हो जाएँ।और ऐसे नेता चाहिए जो हाईकमान से असहमति जताने के बाद तुरंत राजनीतिक निर्वासन के उम्मीदवार न बन जाएँ।
कांग्रेस के पास कभी यह विशाल ताकत थी।उसके कार्यकर्ता हर जगह थे।लोग संगठन में विश्वास करते थे।सेवा, त्याग और जनसंगठन उसके लिए केवल स्वतंत्रता दिवस के भाषणों के शब्द नहीं थे।सेवा दल उस राजनीतिक संस्कृति का एक रूप था।युवा कांग्रेस उसका दूसरा रूप।दोनों संगठन आज भी अस्तित्व में हैं।लेकिन दोनों अपने पुराने प्रभाव और ऊर्जा को फिर से हासिल नहीं कर पाए हैं।
और इससे एक गहरी बात सामने आती है।
राजनीतिक संगठन सामान्यतः किसी एक नाटकीय क्षण में नहीं मरते।वे पहले भीतर से खोखले होते हैं।इमारतें बनी रहती हैं।झंडे बने रहते हैं।दफ्तर बने रहते हैं।लेटरहेड बने रहते हैं।सोशल मीडिया हैंडल बने रहते हैं।प्रेस विज्ञप्तियाँ आती रहती हैं।लेकिन राजनीतिक रक्तसंचार धीरे-धीरे समाप्त होता जाता है।
फिर रस्म शुरू होती है।एक नेता आता है।कैमरे चमकते हैं।कार्यकर्ता नारे लगाते हैं।एक प्रस्ताव पारित होता है।एक समिति बनाई जाती है।एक नया अभियान घोषित होता है।और फिर सब घर चले जाते हैं।
कांग्रेस की स्थिति इसलिए और अधिक त्रासद लगती है क्योंकि यह कोई मामूली राजनीतिक दल नहीं है।यह कोई नया राजनीतिक स्टार्टअप नहीं है।यह आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है।इसने स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया।दशकों तक भारत पर शासन किया।इसने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्यपाल और अनेक पीढ़ियों के राजनीतिक कार्यकर्ता पैदा किए।
और आज कभी-कभी यह एक ऐसी विशाल पुश्तैनी हवेली जैसी लगती है जिसमें बिजली केवल कुछ कमरों में आती है।फर्नीचर अभी भी है।दीवारों पर तस्वीरें अभी भी हैं।नौकर-चाकर अभी भी हैं।कभी-कभार पारिवारिक समारोह भी होता है।
लेकिन सवाल है—चाबी किसके पास है?और फ्यूज बॉक्स कहाँ है?
कांग्रेस को शायद एक और नारे की जरूरत नहीं है।उसे एक काम करने वाली राजनीतिक मशीन की जरूरत है।उसे केवल एक और शानदार यात्रा की जरूरत नहीं है।उसे हजारों ऐसे सामान्य कार्यकर्ताओं की जरूरत है जो कैमरे चले जाने के बाद भी जमीन पर मौजूद रहें।उसे सिर्फ राहुल गांधी को अधिक प्रभावी राष्ट्रीय नेता बनाने की जरूरत नहीं है।उसे ऐसी कांग्रेस बनाने की जरूरत है जो राहुल गांधी के कमरे में न होने पर भी काम कर सके।
यही असली परीक्षा है।क्योंकि जो राजनीतिक दल किसी एक परिवार पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, उसके सामने एक विचित्र समस्या खड़ी हो जाती है।परिवार मजबूत हो तो संगठन निर्भर हो जाता है।परिवार कमजोर हो तो संगठन पंगु हो जाता है।और जब परिवार संगठन को सुधारने की कोशिश करता है, तो संगठन का अधिकांश समय यह अनुमान लगाने में निकल जाता है कि परिवार वास्तव में चाहता क्या है।
इसे विकेंद्रीकरण नहीं कहते।इसे संगठनात्मक योग कह सकते हैं।सब झुकते हैं।कोई आगे नहीं बढ़ता।
तो कांग्रेस के सामने रास्ता क्या है? शायद उत्तर इतिहास के एक असुविधाजनक सबक में छिपा है। स्वतंत्रता आन्दोलन की कांग्रेस इसलिए शक्तिशाली नहीं बनी थी कि किसी ने कोई शानदार संचार रणनीति बना दी थी।वह इसलिए शक्तिशाली बनी क्योंकि उसने आम भारतीयों को संगठित किया था।आजादी के बाद की कांग्रेस केवल इसलिए नहीं बची रही कि उसके पास प्रसिद्ध उपनाम थे।वह इसलिए बची क्योंकि उसके पास विशाल राजनीतिक नेटवर्क था।इसलिए भविष्य की कांग्रेस, यदि वह एक गंभीर राष्ट्रीय शक्ति बनी रहना चाहती है, तो उसे शायद आधुनिक राजनीति के सबसे अनफैशनेबल शब्द को फिर से खोजना होगा—संगठन।न कि केवल छवि।न कि केवल अतीत की याद।न कि केवल वंशानुगत विरासत।न कि लगातार पुनर्गठन।
संगठन।
ग्रैंड ओल्ड पार्टी का भविष्य अभी समाप्त नहीं हुआ है।लेकिन इतिहास बेहद निर्मम होता है।वह राजनीतिक दलों को इसलिए सुरक्षित नहीं रखता कि कभी वे बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे।कभी ब्रिटिश साम्राज्य भारत पर शासन करता था।कभी सोवियत संघ दुनिया को भयभीत करता था।कभी ब्रिटेन की लिबरल पार्टी राजनीति की प्रमुख शक्ति थी।राजनीतिक संगठन आश्चर्यजनक तेजी से इतिहास की वस्तु बन सकते हैं।
और शायद यही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबक है।जिस पार्टी ने कभी लाखों भारतीयों को मार्च करना सिखाया था, उसे आज शायद फिर से चलना सीखना पड़ रहा है।जिस पार्टी के कार्यकर्ता कभी हर जगह दिखाई देते थे, उसे अब यह खोजने की जरूरत है कि वे कार्यकर्ता आखिर गए कहाँ।जिस पार्टी ने कभी पीढ़ी-दर-पीढ़ी नेता पैदा किए, उसे यह पूछना होगा कि उसकी नेतृत्व-निर्माण की पाइपलाइन इतनी संकरी क्यों हो गई।और जिस पार्टी ने कभी खुद को सत्ता की स्वाभाविक दावेदार माना था, उसे शायद सबसे असुविधाजनक सवाल का सामना करना होगा—जब कांग्रेस भारतीय राजनीति का केन्द्र नहीं रहेगी, तब कांग्रेस का क्या होगा? इस सवाल का जवाब किसी और समिति से नहीं मिलेगा।किसी और पारिवारिक तस्वीर से नहीं मिलेगा।और निश्चित रूप से किसी और प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी नहीं मिलेगा।
किसी न किसी को पतवार संभालनी होगी।क्योंकि जहाज़ बहुत विशाल है।इतिहास बहुत शानदार है।यात्री अब भी आपस में बहस कर रहे हैं।कर्मीदल निर्देशों की प्रतीक्षा कर रहा है।कप्तान का केबिन आबाद है।और पुल पर शायद कोई अकेला नाविक कम्पास को घूरते हुए पूछ रहा है—“माफ कीजिए… क्या किसी को सचमुच पता है कि हम जा कहाँ रहे हैं?”
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