कभी-कभी राजनीति, धर्म और विडम्बना इस तरह एक-दूसरे से मिल जाते हैं कि व्यंग्यकार को लगता है कि अब उसे कुछ नया गढ़ने की जरूरत ही नहीं।
फ्रांस में हुआ हालिया BAPS विवाद ऐसा ही एक उदाहरण है।
पेरिस के पास Bussy-Saint-Georges में BAPS का एक भव्य नया मंदिर खुला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका वर्चुअल उद्घाटन किया और इसे भारत-फ्रांस सांस्कृतिक संबंधों की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। BAPS ने भी इसे आध्यात्मिकता, सद्भाव और सार्वभौमिक भाईचारे का प्रतीक बताया।
और फिर आया Eiffel Tower।
BAPS के साधुओं और प्रतिनिधियों का एक दल Eiffel Tower गया।
Swaminarayan परम्परा के साधु ब्रह्मचर्य के अत्यंत कठोर नियमों का पालन करते हैं। BAPS के अपने साहित्य में बताया गया है कि साधुओं के लिए महिलाओं से अनावश्यक बातचीत, शारीरिक संपर्क और कई प्रकार के सामाजिक सम्पर्क से बचना आवश्यक है।
यह उनकी धार्मिक आस्था और साधना का हिस्सा है। और उन्हें अपनी धार्मिक साधना का अधिकार है।
लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी कहानी बदल दी।
रिपोर्टों के अनुसार, Eiffel Tower के कुछ महिला कर्मचारियों को अपने कार्यस्थलों से हटने या BAPS प्रतिनिधिमंडल से सम्पर्क सीमित करने के लिए कहा गया। दूसरे शब्दों में, कुछ महिलाओं को अस्थायी रूप से अदृश्य होने के लिए कहा गया ताकि पुरुष साधु अपनी धार्मिक मर्यादा बनाए रख सकें।
Eiffel Tower के कर्मचारियों को इसमें आध्यात्मिक ज्ञान कम और कार्यस्थल पर भेदभाव अधिक दिखाई दिया। उन्होंने हड़ताल कर दी। Eiffel Tower कुछ समय के लिए बंद हो गया। फ्रांसीसी अधिकारियों ने जांच शुरू कर दी।
BAPS ने इस बात से इनकार किया कि उसने किसी को प्रवेश से रोकने या महिलाओं के साथ भेदभाव करने को कहा था। संगठन ने कहा कि यात्रा पहले से इस तरह आयोजित की गई थी कि व्यवधान कम से कम हो। फिर भी उसने इस घटना से किसी को हुई असुविधा या ठेस के लिए खेद व्यक्त किया।
और अचानक फ्रांस के सामने एक बहुत पुराना सवाल खड़ा हो गया: किस बिन्दु पर किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता किसी दूसरे व्यक्ति के कार्यस्थल के अधिकार से टकराने लगती है?
यह एक बिल्कुल जायज़ सवाल है।
लेकिन भारत के लिए इससे भी ज्यादा असुविधाजनक एक दूसरा सवाल है।
जब महिला मुस्लिम होती है तो उसकी आज़ादी का सवाल इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाता है, लेकिन जब वही महिला किसी हिन्दू धार्मिक नेता के सामने खड़ी होती है तो अचानक मामला धार्मिक संवेदनशीलता का हो जाता है?
यहीं से राजनीति लगभग हास्यास्पद हो जाती है। मोदी सरकार ने बार-बार स्वयं को मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति और सशक्तिकरण का समर्थक बताया है।
2019 में सरकार ने तत्काल तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाला कानून बनाया और इसे महिलाओं के अधिकार तथा लैंगिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में प्रस्तुत किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कई अवसरों पर मुस्लिम महिलाओं को इस सुधार की लाभार्थी बताया है। कर्नाटक के हिजाब विवाद के दौरान भी मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा, अधिकार और विकास को लेकर राजनीतिक बहस हुई।
संदेश बिल्कुल स्पष्ट था—धर्म के नाम पर महिलाओं के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
बहुत अच्छी बात है। इस सिद्धान्त का स्वागत होना चाहिए। लेकिन सिद्धान्तों की एक बहुत खराब आदत होती है। वे हमसे निरंतरता की मांग करते हैं। क्योंकि यदि हिजाब पहनने वाली महिला को धार्मिक या पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति की आवश्यकता है, तो उस समय क्या होता है जब कोई दूसरी धार्मिक व्यवस्था यह कहती है कि महिलाओं को पुरुष साधुओं के सामने नहीं आना चाहिए? क्या लैंगिक समानता के साथ भी कोई फुटनोट आता है?
शायद हमारी राजनीति के पास एक अलग शब्दकोश है।'आजादी' का अर्थ है मुस्लिम महिलाओं को उन धार्मिक प्रथाओं से मुक्त करना जिन्हें हम दमनकारी मानते हैं।
'परम्परा' का अर्थ है उन हिन्दू प्रथाओं का सम्मान करना जिनमें पुरुषों और महिलाओं को अलग रखा जाता है।
और ’पाखंड'? वह शब्द, स्वाभाविक रूप से, केवल विपक्ष के लिए सुरक्षित है।
Eiffel Tower की घटना इस विरोधाभास को बेहद साफ कर देती है।
BAPS का सिद्धान्त कोई रहस्य नहीं है। BAPS स्वयं बताता है कि उसके साधु कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। उसके साहित्य में यह तक बताया गया है कि साधु महिलाओं से बातचीत करने, उन्हें छूने, जानबूझकर उनकी ओर देखने या उनकी संगति तलाशने से बचते हैं। सामूहिक प्रार्थना के दौरान भी पुरुषों और महिलाओं के अलग बैठने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
किसी साधु का स्वयं महिलाओं से बातचीत न करना एक बात है।
किसी महिला को, जो किसी सार्वजनिक संस्थान में अपना काम कर रही है, वहाँ से हटने या अदृश्य होने के लिए कहना दूसरी बात है।
पहली चीज धार्मिक स्वतंत्रता है।
दूसरी चीज दूसरे नागरिकों के अधिकारों और कार्यस्थल पर समानता के सवाल पैदा करती है।
और यही कारण है कि फ्रांस में इतनी तीखी प्रतिक्रिया हुई। फ्रांस का तर्क यह नहीं था कि BAPS को अपनी मान्यताएँ छोड़ देनी चाहिए।
तर्क कहीं सरल था—
आप जो मानना चाहें, मानिए।
लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं को निभाने के लिए फ्रांस की महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अदृश्य नहीं बनाया जा सकता।
यह एक समझने योग्य गणतांत्रिक सिद्धान्त है। और यही भारत के लिए एक असहज विडम्बना पैदा करता है।
वही भारतीय राजनीतिक व्यवस्था जो मुस्लिम दुनिया को महिलाओं की मुक्ति का पाठ पढ़ाती है, अब स्वयं एक ऐसे धार्मिक विवाद से जुड़ी दिखाई दे रही है जिसमें महिलाओं को कथित रूप से इसलिए पीछे हटने को कहा गया क्योंकि कुछ पुरुष उनसे सम्पर्क नहीं करना चाहते थे।
विडम्बना यहीं खत्म नहीं होती।
अब आते हैं जाति पर।
BAPS स्वयं को एक मानवीय और आध्यात्मिक संस्था के रूप में प्रस्तुत करता है।उसके मंदिर भव्य हैं।उसके स्वयंसेवक बड़े पैमाने पर सेवा कार्य करते हैं।उसका वैश्विक नेटवर्क प्रभावशाली है।
ये सारी बातें एक साथ सच हो सकती हैं।लेकिन इसके साथ एक और बात भी सच है।
अमेरिका में मंदिर निर्माण से जुड़े भारतीय श्रमिकों के साथ व्यवहार को लेकर BAPS के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
2021 में न्यू जर्सी के Robbinsville मंदिर से जुड़े 200 से अधिक श्रमिकों ने संघीय अदालत में मुकदमा दायर किया। आरोपों में जबरन श्रम, अत्यधिक लंबे काम के घंटे, बहुत कम मजदूरी, आवाजाही पर प्रतिबंध, पासपोर्ट रखने और श्रम तथा आव्रजन कानूनों के उल्लंघन जैसी बातें शामिल थीं।
इन श्रमिकों में बड़ी संख्या कथित रूप से वंचित समुदायों, जिनमें दलित भी शामिल थे, से थी।अमेरिकी संघीय एजेंसियों ने भी मंदिर परिसर में कानून-प्रवर्तन की कार्रवाई की।बाद में इसी तरह के आरोप अमेरिका के कुछ अन्य BAPS-संबद्ध मंदिर निर्माण स्थलों तक भी पहुँचे।
BAPS ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि ये लोग धार्मिक स्वयंसेवक थे तथा धार्मिक श्रमिकों के लिए इस्तेमाल किए गए वीज़ा की व्यवस्था सरकारी एजेंसियों की जानकारी और निगरानी के दायरे में थी।
बाद में कुछ वादी मुकदमे से हट भी गए।इसलिए इन आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन इन विवादों ने एक असहज सवाल जरूर खड़ा किया।
यदि कोई धार्मिक संगठन लगातार सेवा और निस्वार्थ सेवा की बात करता है, तो उस समय क्या होना चाहिए जब सेवा करने वाले लोग स्वयं आरोप लगाएँ कि उनका शोषण किया गया?
और यदि उन लोगों में बड़ी संख्या उन समुदायों की हो जो भारत की जाति व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से सबसे नीचे रहे हैं, तो क्या इस प्रश्न को केवल एक भव्य मंदिर बनाकर समाप्त किया जा सकता है?
नहीं।
संगमरमर जाति को समाप्त नहीं करता।
सोना शोषण को समाप्त नहीं करता।
और कोई विशाल मंदिर अपने आप सामाजिक समानता पैदा नहीं कर देता।
यहीं BAPS की कहानी नरेंद्र मोदी के संदर्भ में और अधिक दिलचस्प हो जाती है।BAPS औपचारिक रूप से RSS या BJP का हिस्सा नहीं है।यह अंतर महत्वपूर्ण है।
BAPS एक स्वतंत्र धार्मिक संगठन है, जिसका अपना नेतृत्व, अपना संस्थागत ढाँचा और अपना विशाल वैश्विक अनुयायी वर्ग है।लेकिन नरेंद्र मोदी और BAPS के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध असाधारण रूप से निकट रहे हैं।मोदी ने दिवंगत प्रमुख स्वामी महाराज के साथ अपने सम्बन्ध को लगभग पिता-पुत्र के सम्बन्ध के रूप में वर्णित किया है।और जब 2024 में अबू धाबी में विशाल BAPS Hindu Mandir का उद्घाटन हुआ, तब मोदी केवल शुभकामनाएँ भेजने वाले प्रधानमंत्री नहीं थे।उन्होंने स्वयं मंदिर का उद्घाटन किया।
भारत सरकार ने इसे भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहुँच का प्रतीक बताया।
BAPS ने भी मंदिर के निर्माण को संभव बनाने में मोदी के नेतृत्व और भारत तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंधों की भूमिका को रेखांकित किया।
फिर वही बात।
विदेश में किसी मंदिर का समर्थन करना अपने आप में कोई अनुचित बात नहीं है।भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार है।भारतीय प्रवासी समुदायों को अपने पूजा स्थल बनाने का भी पूरा अधिकार है।और अबू धाबी में हिन्दू मंदिर का निर्माण अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है।लेकिन जब धार्मिक संस्थाएँ किसी देश की सांस्कृतिक और कूटनीतिक छवि का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाती हैं, तो उनके विवादों का राजनीतिक प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।यदि किसी मंदिर को विदेशों में भारत की सभ्यतागत पहचान का चेहरा बनाया जाता है, तो फिर उस पहचान से जुड़े सवाल भी पूछे जाएंगे।और यहीं वापस आते हैं आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे लोकप्रिय नारों में से एक पर—नारी शक्ति।महिलाओं की शक्ति।महिलाओं की गरिमा।महिलाओं का सशक्तिकरण।
बहुत अच्छी बात है।
लेकिन शायद इस नारे के अंतरराष्ट्रीय संस्करण में एक छोटा-सा फुटनोट जोड़ देना चाहिए—'महिलाओं की शक्ति — सिवाय उस स्थिति के जब कोई visiting holy man उनसे सम्पर्क नहीं करना चाहता हो।'
और शायद एक दूसरा फुटनोट— 'लैंगिक समानता — धार्मिक सुविधा के अनुसार।'
और तीसरा—'धार्मिक स्वतंत्रता — बिल्कुल। लेकिन केवल तब तक जब तक वह किसी और की धार्मिक स्वतंत्रता से न टकराए।'
इससे सरकारी पुस्तिका काफी सरल हो जाएगी।
लेकिन असली मुद्दा BAPS नहीं है।असली मुद्दा है—चयनात्मक सार्वभौमिकता।
हर समाज इस बीमारी से प्रभावित होता है।हम भेदभाव की निन्दा तब करते हैं जब उसे वे लोग करते हैं जिन्हें हम पसंद नहीं करते।और जब वही काम हमारे प्रिय लोग करते हैं तो हम उसे 'परम्परा' कह देते हैं।हम अल्पसंख्यकों से आधुनिकता की मांग करते हैं, लेकिन बहुसंख्यक समुदायों की रूढ़िवादिता को 'प्राचीन ज्ञान' कहकर रोमांटिक बना देते हैं।एक महिला के चेहरे या कपड़ों को लेकर कहते हैं कि वह धार्मिक दमन की शिकार है।दूसरी महिला को सार्वजनिक स्थान से हटाए जाने को 'धार्मिक संवेदनशीलता' कहते हैं।एक समुदाय की धार्मिक रूढ़िवादिता को पिछड़ापन कहते हैं।दूसरे समुदाय की उसी रूढ़िवादिता को परम्परा कहते हैं।
और फिर हम आश्चर्य करते हैं कि लोग राजनीति से इतने निराश क्यों हैं।
इस पूरी बहस से निकलने का एक सरल सिद्धान्त है—किसी महिला के अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं होने चाहिए कि उसके सामने खड़ा पुरुष किस धर्म को मानता है।
यदि किसी मुस्लिम पति को अपनी पत्नी पर अन्यायपूर्ण तलाक थोपने का अधिकार नहीं है, तो यह महिला अधिकारों का प्रश्न है।यदि कोई हिन्दू साधु महिलाओं से बातचीत नहीं करना चाहता, तो यह उसकी धार्मिक स्वतंत्रता है।
लेकिन यदि किसी धार्मिक नियम के कारण किसी असंबंधित महिला को, जो अपना काम कर रही है, अपना कार्यस्थल छोड़ना पड़े, अपनी गरिमा छोड़नी पड़े या पुरुषों के बराबर नागरिक होने का अधिकार छोड़ना पड़े, तो राज्य की जिम्मेदारी है कि उसके अधिकारों की रक्षा करे।
और यही सिद्धान्त हर जगह लागू होना चाहिए।
मुसलमानों पर।हिन्दुओं पर।ईसाइयों पर।सिखों पर।नास्तिकों पर।हर किसी पर।
यही वास्तविक समानता है।
अपने दोस्तों के लिए समानता और अपने विरोधियों के लिए सुधार नहीं।
सुविधा के अनुसार धर्मनिरपेक्षता नहीं।
सुविधा के अनुसार सभ्यतागत अपवाद नहीं।
किसी दूसरे समुदाय का सामना करते समय नारीवाद और अपने समुदाय का सामना करते समय परम्परा नहीं।
Eiffel Tower ने, शायद अनजाने में, भारत को एक उपयोगी आईना दिखा दिया है।और आईने खतरनाक चीज होते हैं।उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने प्रधानमंत्री खड़ा है, साधु है, नेता है, नारीवादी है, धार्मिक सुधारक है या टेलीविजन एंकर।आईना केवल वही दिखाता है जो सामने मौजूद है।और शायद पेरिस से आई सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर भव्य मंदिर की नहीं है।वह Eiffel Tower की भी नहीं है।वह विरोध कर रहे कर्मचारियों की भी नहीं है।सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर उस विडम्बना की है जिसमें महिलाओं से कहा जाता है कि वे अदृश्य हो जाएँ ताकि पुरुष अपनी धार्मिक शुचिता बनाए रख सकें।
क्योंकि यदि महिलाओं की मुक्ति वास्तव में सिद्धान्त है, तो वह इस बात पर निर्भर नहीं कर सकती कि चर्चा किस धर्म की हो रही है।अन्यथा महिलाओं को मुक्त नहीं किया जा रहा।उन्हें केवल किसी और की विचारधारा के शतरंज के बोर्ड पर इधर-उधर किया जा रहा है।
और शायद यही राजनीति और धर्म की सबसे पुरानी चाल है।
महिलाओं से कहिए कि उनकी रक्षा की जा रही है।कहिए कि उन्हें मुक्त किया जा रहा है।कहिए कि उन्हें सम्मान दिया जा रहा है।और फिर चुपचाप तय कर दीजिए कि उन्हें कहाँ खड़ा होना है।
किसी भी सभ्यता की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह कितने भव्य मंदिर बनाती है।असली परीक्षा यह है कि उन मंदिरों के निर्माण, संचालन, सफाई और सेवा से जुड़ी महिलाओं को क्या पुरुषों के समान सार्वजनिक स्थान में खड़े होने का अधिकार है — बिना यह सुने कि उन्हें कहीं और चले जाना चाहिए।
यही कसौटी लगातार लागू होनी चाहिए।
BAPS पर।BJP पर।सरकार पर।हर धर्म पर।और, असुविधाजनक रूप से, हम सब पर।क्योंकि समानता तभी अर्थपूर्ण होती है जब उसे उन लोगों पर भी लागू किया जाए जिनकी मान्यताओं से हम सहमत नहीं हैं।वरना वह भी मंदिर की दीवार पर बनी एक और खूबसूरत नक्काशी भर है।
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