भारत के नवीनतम चुनाव आयोग विवाद में कुछ ऐसा है जो बेहद भारतीय है।सिर्फ भारत में ऐसा हो सकता है कि एक ही संवैधानिक संस्था में तीन लोग बैठें, उनमें से दो कथित तौर पर किए जा रहे काम पर अपनी आपत्तियां लिखित रूप में दर्ज करें, मतदाताओं के नाम काटे जाने, नए नाम जोड़े जाने, सॉफ्टवेयर तक पहुंच और फॉर्म 6 को लेकर सवालों का ढेर लग जाए और फिर वही संस्था गंभीर मुद्रा में आकर घोषणा करे: “सब कुछ सर्वसम्मति से हुआ।”
वाह!
फैसले पर आपत्ति भी थी और वह सर्वसम्मत भी था।निर्वाचन आयुक्त चिंतित भी थे, लेकिन कोई मतभेद नहीं था।व्यवस्था कथित तौर पर केंद्रीकृत भी थी, लेकिन किसी को पहुंच से वंचित भी नहीं किया जा रहा था।30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम गायब हो गए, फिर भी हमें आश्वस्त किया जा रहा है कि लोकतंत्र पूरी तरह स्वस्थ है।
और अगर आप भ्रमित हैं, तो चिंता मत कीजिए।आखिर आप सिर्फ एक मतदाता हैं।आपसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि आप समझें कि यह मशीनरी कैसे काम करती है।आपसे सिर्फ वोट डालने की उम्मीद की जाती है।बेहतर होगा कि वोट डालने से पहले आप यह साबित कर दें कि किसी पिछली मतदाता सूची के पुनरीक्षण के समय भी आपका अस्तित्व था।
स्वागत है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, यानी SIR, में।संक्षिप्त नाम सुनने में तो काफी मासूम लगता है। लगभग स्नेहपूर्ण।सर।मानो मतदाता किसी औपनिवेशिक दफ्तर में प्रवेश कर रहा हो।
“गुड मॉर्निंग, सर।”
“गुड मॉर्निंग। क्या आप मतदाता हैं?”
“जी, सर।”
“साबित कीजिए।”
“मैं वर्षों से वोट डाल रहा हूं।”
“बहुत बढ़िया। अब साबित कीजिए कि आप वोट डालते रहे हैं।”
“लेकिन मेरा नाम मतदाता सूची में है।”
“था।”
“था?”
“जी। हमने उसका पुनरीक्षण कर दिया।”
“क्यों?”
“उसे सही करने के लिए।”
“क्या पहले वह सही नहीं थी?”
“इसीलिए तो हमने उसका पुनरीक्षण किया।”
और यही है नौकरशाही की महान प्रतिभा: व्यवस्था खुद वह समस्या पैदा कर सकती है जिसे हल करने की क्षमता भी सिर्फ उसी के पास होती है।
विवाद तब और गहरा गया जब इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में बताया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग दस महीनों के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म 6, चुनावी रोल के सॉफ्टवेयर और मतदाता डेटाबेस तक पहुंच से जुड़े फैसलों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं।एक मामले में, रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियों में संबंधित कार्रवाई को “अनधिकृत और अवैध” तक बताया गया था। दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने चुनावी डेटा के क्रमिक केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई थी।
चौदह आपत्तियां।
चौदह!
किसी बिंदु पर यह सामान्य कार्यालयी पत्राचार नहीं रह जाता।
यह तो वैवाहिक परामर्शदाता के सामने रखी गई बैठक की कार्यवाही जैसा लगने लगता है।
“प्रिय मुख्य निर्वाचन आयुक्त महोदय, हमने इस विषय पर कई बार चर्चा की है। आप लगातार वही कर रहे हैं। हम लगातार आपत्ति कर रहे हैं। शायद हमें किसी विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।”
लेकिन चुनाव आयोग के पास इसका एक बिल्कुल सम्मानजनक उत्तर है।उसका कहना है कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।शनिवार को हुई पूर्ण बैठक के बाद आयोग ने इसे दोहराते हुए कहा कि 24 जून 2025 का SIR आदेश सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ था और 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा। आयोग ने उन मतदाताओं की सहायता के लिए कई उपायों की घोषणा भी की जिन्हें नोटिस मिले हैं। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि बैठक के एजेंडे पहले से प्रसारित किए जाएं और कार्यवाही के मिनट्स जारी किए जाएं।
आह! मिनट्स!
अब हम सही दिशा में जा रहे हैं।क्योंकि जाहिर तौर पर लोकतंत्र के इस चमत्कार के लिए सिर्फ चुनाव पर्याप्त नहीं हैं।चुनावों पर होने वाली बैठकों के मिनट्स भी जरूरी हैं।और शायद पूरा विवाद अंततः एक बेहद सरल सवाल में सिमट सकता है: किसे क्या पता था, कब पता था और किसने उसे अधिकृत किया था? यह कोई मामूली नौकरशाही सवाल नहीं है। चुनाव आयोग कोई रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन नहीं है जो यह तय कर रही हो कि पार्क में दो बेंच होंगी या तीन।
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों और मतदाता सूचियों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण चुनाव आयोग को सौंपता है। और जब एक से अधिक निर्वाचन आयुक्त नियुक्त होते हैं, तो संविधान मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आयोग का अध्यक्ष बनाता है। लेकिन 2023 का कानून एक असुविधाजनक बात कहता है उन लोगों के लिए जो मानते हैं कि CEC का मतलब है: Chief Everything Commissioner.
कानून की धारा 18 कहती है कि आयोग का काम, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। लेकिन यदि निर्वाचन आयुक्तों में मतभेद हो, तो मामला बहुमत से तय होगा। दूसरे शब्दों में: CEC अध्यक्ष है, सम्राट नहीं। चुनाव आयोग एक Commission है।यह नहीं: “मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके सहयोगी कलाकारों की प्रस्तुति।” यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है।क्योंकि इस व्यवस्था की संवैधानिक खूबसूरती ही सामूहिक निर्णय प्रक्रिया में है।
कल्पना कीजिए कि रिजर्व बैंक का गवर्नर घोषणा करता है: “अच्छी खबर है। मौद्रिक नीति सर्वसम्मति से तय हुई।” तुरंत दो डिप्टी गवर्नर तीन पन्नों की आपत्तियां निकाल लेते हैं।
गवर्नर: “वे तो सिर्फ सुझाव थे।”
डिप्टी गवर्नर: “हमने बिल्कुल उलटा कहा था।”
गवर्नर: “हां, लेकिन हमने सर्वसम्मति से कहा था।”
स्वागत है भारतीय संस्थागत व्याकरण में।राजनीति में असहमति को अक्सर साजिश समझ लिया जाता है।नौकरशाही में असहमति को “फीडबैक” कहा जाता है।क्रिकेट में असहमति को “अपील” कहा जाता है।और चुनाव आयोग में शायद यह बन सकती है: फुटनोट सहित सर्वसम्मति।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा सिर्फ यह नहीं था कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने आपत्ति की।सवाल यह है कि उन्होंने किस बात पर आपत्ति की।फॉर्म 6 कोई रेस्तरां का मेन्यू नहीं है।यह वह वैधानिक फॉर्म है जिसके माध्यम से पात्र नागरिक मतदाता बनने के लिए आवेदन करता है।
लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, इसमें एक नया सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक को पिछले SIR की मतदाता सूची से जोड़ा गया और उससे यह बताने को कहा गया कि उसका अपना, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी सूची में था या नहीं।दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधानिकता पर सवाल उठाया।
कल्पना कीजिए, 18 साल के एक युवक से कहा जाता है: “बधाई हो। अब आप वयस्क हैं।”
“धन्यवाद।”
“आप वोट दे सकते हैं।”
“बहुत बढ़िया।”
“लेकिन पहले यह साबित कीजिए कि आपके दादा का नाम बीस साल पहले किसी मतदाता सूची में था या नहीं।”
“मेरे दादा की मृत्यु मेरे जन्म से पहले हो गई थी।”
“यह दुर्भाग्यपूर्ण है।”
“क्या मैं फिर भी वोट दे सकता हूं?”
“कृपया दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करें कि आपके दादा का अस्तित्व था।”
इस तरह लोकतंत्र एक पारिवारिक इतिहास की परीक्षा बन सकता है।आपके दादा कौन थे? उन्होंने कहां वोट दिया था?उनका नाम सही लिखा गया था? क्या सॉफ्टवेयर उन्हें पसंद करता था? और अगर सॉफ्टवेयर को वे पसंद नहीं आए? खैर, लोकतंत्र को तकनीकी समस्या आ गई है।और अब हम इस पूरे प्रकरण के सबसे स्वादिष्ट आधुनिक हिस्से पर आते हैं: सॉफ्टवेयर।दशकों से भारतीयों को सिखाया गया है कि लोकतंत्र नागरिकों, संविधान, राजनीतिक दलों, घोषणापत्रों और वोटों के बारे में है।लेकिन शायद हम एक महत्वपूर्ण भागीदार को भूल गए: डेटाबेस।इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने चुनावी डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण और इस बात पर चिंता जताई कि क्या राज्य और निर्वाचन क्षेत्र स्तर के वैधानिक अधिकारियों के पास उचित पहुंच बनी हुई है।एक निर्वाचन आयुक्त ने कथित तौर पर यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट का सुझाव दिया कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव केवल अधिकृत वैधानिक अधिकारी ही कर सकें।
और यहीं भारतीय मतदाता उस महान लोकतांत्रिक विरोधाभास से टकराता है।
आप वास्तविक इंसान हो सकते हैं।लेकिन अगर डेटाबेस आपको पहचानता नहीं है, तो आप प्रशासनिक दृष्टि से अस्तित्वहीन हो गए।आप भौतिक रूप से मौजूद हैं।सामाजिक रूप से मौजूद हैं।आपके पास आधार कार्ड हो सकता है, पासपोर्ट हो सकता है, PAN कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली का बिल, बैंक खाता, संपत्ति के कागज और 43 व्हाट्सऐप ग्रुप भी हो सकते हैं जो यह साबित करते हों कि आप जीवित हैं।लेकिन डेटाबेस कहता है: “नहीं।” और लोकतंत्र जवाब देता है: “डेटाबेस बेहतर जानता है।”
जांच के अनुसार, गोवा में 97 मतदाताओं को सुनवाई के बाद निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों ने पात्र पाया। लेकिन कथित तौर पर सॉफ्टवेयर की सीमाओं के कारण अंतिम मतदाता सूची की समय-सीमा से पहले इन फैसलों को ठीक से दर्ज नहीं किया जा सका।बाद में चुनाव आयोग ने कहा कि इन 97 में से 81 मतदाताओं ने नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म 6 भर दिया है।97 सुनने में छोटी संख्या लग सकती है।लेकिन यही तो बात है।लोकतंत्र में ऐसी कोई न्यूनतम संख्या नहीं होती जिसके नीचे किसी मताधिकार से वंचित नागरिक को सांख्यिकीय रूप से महत्वहीन मान लिया जाए।एक मतदाता मायने रखता है।भले ही वह कमरे में अकेला मतदाता क्यों न हो।खासकर तब।क्योंकि डिजिटलीकरण का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि कंप्यूटर गलतियां करते हैं।खतरा यह है कि इंसान कंप्यूटर की गलतियों को तथ्य मानना शुरू कर देते हैं।
“सॉफ्टवेयर ने आपको अस्वीकार कर दिया।”
“लेकिन मैं पात्र हूं।”
“हां।”
“तो इसे ठीक कीजिए।”
“हम नहीं कर सकते।”
“क्यों?”
“सॉफ्टवेयर इसकी अनुमति नहीं देता।”
“सॉफ्टवेयर को कौन नियंत्रित करता है?”
“इतने कठिन सवाल मत पूछिए।”
और अचानक फ्रांज काफ्का को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नियुक्त कर दिया जाता है।
लेकिन राजनीति को मत भूलिए।विपक्ष ने इस विवाद को संस्थागत कब्जे और “वोट चोरी” का प्रमाण बताया है।सत्तारूढ़ पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर निराधार दावे करने और संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया है।चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक तकनीकी नोट और चिंताएं सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अंतिम SIR फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।इसलिए अब हमारे सामने दो प्रतिस्पर्धी कथाएं हैं।
पहली: “चुनाव आयोग के साथ छेड़छाड़ की जा रही है।”
दूसरी: “विपक्ष चुनाव आयोग के विवाद के साथ राजनीति कर रहा है।”
और इन दोनों कथाओं के बीच बैठा है बेचारा मतदाता।उसके हाथ में मतदाता पहचान पत्र है।वह टेलीविजन देख रहा है।वह नेताओं को चिल्लाते हुए सुन रहा है।और सोच रहा है: “मेरा नाम अभी भी सूची में है या नहीं?” शायद अंततः यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।यह नहीं कि राहुल गांधी ने क्या बयान दिया।यह नहीं कि बीजेपी ने कौन-सी प्रेस कॉन्फ्रेंस की।यह नहीं कि एक राजनीतिक दल दूसरे को अलोकतांत्रिक कह रहा है।यह भी नहीं कि कोई मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है।
मूल सवाल है: क्या एक सामान्य नागरिक इस बात पर भरोसा कर सकता है कि उसका नाम मतदाता सूची में रहेगा और यदि उसे हटाया जाता है तो वह प्रक्रिया पारदर्शी, कानूनी और चुनौती देने योग्य होगी?
यही असली मुद्दा है।
चुनाव आयोग की नवीनतम प्रतिक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम जरूर हैं।आयोग ने कहा है कि जिन मतदाताओं को विसंगतियों के कारण नोटिस मिले हैं, उन्हें सामान्यतः निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी।बूथ लेवल अधिकारी उनके घर से दस्तावेज ले सकते हैं।अपवादस्वरूप मामलों में ऑनलाइन सुनवाई की जा सकती है।हेल्प डेस्क और विशेष शिविर लगाए जाएंगे।और बाहर रह गए मतदाताओं तथा पहली बार वोट देने वाले नागरिकों की सहायता के लिए विशेष नामांकन अभियान चलाए जाएंगे।
अच्छी बात है।
लेकिन संस्थागत विश्वास केवल प्रेस नोट जारी करने से वापस नहीं आता।वह मशीनरी को दिखाई देने योग्य बनाने से वापस आता है।यदि मतभेद थे, तो मतभेद सामने रखिए।यदि वे केवल तकनीकी सुझाव थे, तो बताइए कि उनका क्या हुआ।यदि हर अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुआ, तो रिकॉर्ड दिखाइए।यदि सॉफ्टवेयर में बदलाव कानूनी थे, तो उसका अधिकार और आधार दर्ज कीजिए।यदि मतदाताओं को गलत तरीके से बाहर कर दिया गया, तो उन्हें वापस शामिल कीजिए।यदि अधिकारियों की पहुंच सीमित थी, तो बताइए क्यों।और यदि कोई गलत काम नहीं हुआ, तो पारदर्शिता दुनिया में सबसे आसान बचाव होना चाहिए।
लोकतंत्र कोई जादू का खेल नहीं होना चाहिए।नागरिक को जादूगर के हाथों पर नजर रखने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।उसे मतपेटी की जांच करने का अधिकार होना चाहिए।और यहीं हम मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने या उनके खिलाफ कार्रवाई की बढ़ती मांगों तक पहुंचते हैं।संविधान ने जानबूझकर CEC को हटाने की प्रक्रिया को बेहद कठिन बनाया है।अनुच्छेद 324 के तहत CEC को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा प्राप्त है और उन्हें हटाने के लिए संसद की वही प्रक्रिया लागू होती है, जिसमें दुर्व्यवहार या अक्षमता का प्रमाण आवश्यक है।इसलिए टेलीविजन पर चिल्लाकर “इन्हें महाभियोग लगाकर हटाओ” कह देने से ऐसा हो नहीं जाता।भारतीय संवैधानिक कानून कोई गुस्से से भरी टेलीविजन बहस नहीं है।शुक्र है।वरना आधा देश विज्ञापन आने से पहले ही महाभियोग झेल चुका होता।
इस बीच SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मध्यस्थ के रूप में उभर रही है।और इसमें एक और शानदार विडंबना छिपी है।जिस संस्था का काम चुनावों की निगरानी करना है, उसी से अब उस संस्था को अपनी प्रक्रियाओं की व्याख्या करनी पड़ रही है जिसका काम संविधान की व्याख्या करना है।और इस तरह भारत की संवैधानिक पारिवारिक बैठक जारी है।
संसद कहती है: “हम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
सरकार कहती है: “हमारे पास जनादेश है।”
विपक्ष कहता है: “हम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
चुनाव आयोग कहता है: “हमने चुनाव कराया।”
सुप्रीम कोर्ट कहता है: “रिकॉर्ड दिखाइए।”
और मतदाता कहता है: “क्या कोई मुझे बता सकता है कि मेरा नाम अभी भी वहां है?”
यही व्यंग्य के नीचे छिपी असली त्रासदी है।चुनाव केवल वह अवसर नहीं हैं जब राजनेताओं को अचानक “जनता” शब्द याद आ जाता है।वे वह तंत्र हैं जिसके माध्यम से नागरिक तय करते हैं कि उनका शासन कौन करेगा।इसलिए चुनावी रेफरी का सिर्फ निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं है।उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।और उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह यह दिखा सके कि फैसले किस तरह लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में भी चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए केंद्रीय संवैधानिक संस्था बताया गया था और उसके नियुक्ति तंत्र की स्वतंत्रता पर विचार किया गया था।इसके बाद 2023 के नियुक्ति कानून के कुछ पहलुओं को चुनौती देने वाली कानूनी कार्यवाहियां भी हुईं। इनमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किए जाने का मुद्दा भी है।तो शायद महान भारतीय लोकतांत्रिक जादू का खेल अब अपने सबसे महत्वपूर्ण अंक पर पहुंच गया है।
सवाल यह नहीं: “किसने किसका वोट चुराया?”
यह भी नहीं: “कौन झूठ बोल रहा है?”
यह भी नहीं: “किसे इस्तीफा देना चाहिए?”
असली सवाल है: क्या हमारे वोटों की गिनती का जिम्मा जिस संस्था को सौंपा गया है, वह देश को यह विश्वास दिला सकती है कि वह किसी और चीज की गिनती नहीं कर रही?
क्योंकि लोकतंत्र खराब सरकार को झेल सकता है।वह एक शर्मनाक विपक्ष को भी झेल सकता है।वह शोर मचाते टेलीविजन एंकरों को भी झेल सकता है।वह ऐसे राजनेताओं को भी झेल सकता है जो एक-दूसरे पर ताजमहल चुराने के अलावा लगभग हर संभव आरोप लगा दें।लेकिन लोकतंत्र उस व्यापक धारणा को आसानी से नहीं झेल सकता कि रेफरी ही मुकाबले का हिस्सा बन गया है।
और अब आता है अंतिम मजाक।
चुनाव आयोग का काम हमें बताना है कि कौन जीता।लेकिन इस समय पूरा देश यह जानने का इंतजार करता हुआ दिखाई देता है कि क्या चुनाव आयोग खुद कुछ अधिक बुनियादी चीज वापस जीत सकता है: मतदाता का विश्वास।और विश्वास, मतदाता सूची में किसी नाम की तरह, सिर्फ एक बटन दबाकर वापस नहीं लाया जा सकता।कोई सॉफ्टवेयर अपडेट यह काम नहीं कर सकता।कोई प्रेस नोट यह काम नहीं कर सकता।कोई नारा यह काम नहीं कर सकता।इसके लिए एक बेहद पुरानी चीज चाहिए। पारदर्शिता।
जरा कल्पना कीजिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, केंद्रीकृत डेटाबेस और चुनावी सॉफ्टवेयर के इस युग में भारतीय लोकतंत्र को एक बार फिर सभ्यता की सबसे पुरानी तकनीक पर निर्भर होना पड़ सकता है: सच बताना, कागजात दिखाना और नागरिक को यह देखने देना कि आखिर हुआ क्या था।
क्या क्रांतिकारी विचार है!
शायद किसी को इसे फॉर्म 6 में भी जोड़ देना चाहिए।
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